रेकी की जड़ें
‘रेई’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय, ‘की’ का अर्थ है प्राण ऊर्जा। जापान के क्योटो शहर में 1922 में डॉ. मिकाओ उसुई ने यह पद्धति शुरू की। आज दुनिया भर के अस्पतालों में भी यह पूरक चिकित्सा के रूप में इस्तेमाल होती है।
जीवन के पाँच सिद्धांत
आज क्रोध नहीं। आज चिंता नहीं। हर चीज़ के लिए कृतज्ञ रहिए। ईमानदारी से काम कीजिए। हर जीव पर करुणा। इन पाँच सिद्धांतों को रोज़ याद रखना ही रेकी का आधार है।
सत्र कैसे चलता है
ग्राहक कपड़ों समेत एक बिस्तर पर लेटता है। चिकित्सक हाथ शरीर पर या कुछ इंच ऊपर रखकर हर चक्र पर 3–5 मिनट ठहरता है। सत्र के दौरान शांति, गुनगुनाहट या हल्की झुनझुनी हो सकती है — यह सामान्य है।
स्व-रेकी
Level I का प्रशिक्षण ले चुका कोई भी व्यक्ति रोज़ खुद को रेकी दे सकता है। 12 हाथ-स्थितियाँ — सिर, आँखें, कान, गला, छाती, पेट — हर एक पर 3 मिनट। रोज़ 20 मिनट लगातार करें तो नींद, पाचन और तनाव में फ़र्क़ दिखने लगेगा।
रेकी क्या नहीं है
रेकी चिकित्सा का विकल्प नहीं है। कैंसर, मधुमेह या मानसिक रोग में यह डॉक्टर के साथ चलने वाली पूरक चिकित्सा भर है। चिकित्सक का प्रमाणपत्र देखना मत भूलिए। एक ही सत्र में चमत्कार की उम्मीद ग़लत है।